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Thursday, 15 September 2022

New shairy 2022/2023

सर में सौदा भी नहीं___ दिल में तमन्ना भी नहीं 
लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं 
سر میں سودا بھی نہیں_ دل میں تمنا بھی نہیں 
لیکن اس ترک محبت کا ____بھروسا بھی نہیں 
मेहरबानी को___ मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त 
आह अब मुझ से तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं 
مہربانی کو___ محبت نہیں کہتے اے دوست 
آہ اب مجھ سے__ تری رنجش بے جا بھی نہیں 
एक मुद्दत से___ तिरी याद भी आई न हमें 
और हम भूल गए हों __तुझे ऐसा भी नहीं 
ایک مدت سے___ تری یاد بھی آئی نہ ہمیں 
اور ہم بھول گئے ہوں_ تجھے ایسا بھی نہیں
ये भी सच है ___कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर 
ये भी सच है__ कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं 
یہ بھی سچ ہے__ کہ محبت پہ نہیں میں مجبور 
یہ بھی سچ ہے__ کہ ترا حسن کچھ ایسا بھی نہیں 
यूँ तो ____हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़ 
मगर ऐ दोस्त ___कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं 
یوں تو__ ہنگامے اٹھاتے نہیں دیوانۂ عشق 
مگر اے دوست__ کچھ ایسوں کا ٹھکانا بھی
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि फ़िराक़
है तिरा दोस्त___ मगर आदमी अच्छा भी नहीं
منہ سے ہم اپنے برا تو نہیں کہتے کہ فراق
ہے ترا دوست مگر آدمی اچھا بھی نہیں
फ़िराक़ गोरखपुरी
فراق گورکھپوری


नज़र की धूप में___ साए घुले हैं शब की तरह
मैं कब उदास नहीं था__ मगर न अब की तरह
نظر کی دھوپ میں _سائے گھلے ہیں شب کی طرح
میں کب اداس نہیں تھا___ مگر نہ اب کی طرح
फिर आज__ शहर-ए-तमन्ना की रहगुज़ारों से
गुज़र रहे हैं कई लोग__ रोज़-ओ-शब की तरह
پھر آج _____شہرِ تمنا کی __رہگزاروں سے
گزر رہے ہیں کئی لوگ_ روز و شب کی طرح
तुझे तो_______ मैंने बड़ी आरज़ू से चाहा था
ये क्या कि छोड़ चला_ तू भी और सब की तरह
تجھے تو میں نے_____ بڑی آرزو سے چاہا تھا
یہ کیا کہ چھوڑ چلا تو بھی اور سب کی طرح
फ़सुर्दगी है_____ मगर वज्ह -ए-ग़म नहीं मालूम
कि दिल पे बोझ-सा है _रंज-ए-बे-सबब की तरह
فسردگی ہے_____ مگر وجۂ غم نہیں معلوم
کہ دل پہ بوجھ سا ہے _رنجِ بے سبب کی طرح
खिले तो अबके भी___ गुलशन में फूल हैं लेकिन
न मेरे ज़ख़्म की सूरत______ न तेरे लब की तरह
کھلے تو اب کے بھی_ گلشن میں پھول ہیں لیکن
نہ میرے زخم کی صورت_ نہ تیرے لب کی طرح
अहमद फ़राज़
احمد فراز


पेश ए ख़ेमा _ये किसी एक मुसीबत का नहीं
दुख है कुछ और मेरी जान _मसाफ़त का नहीं
پیش خیمہ __یہ کسی ایک مصیبت کا نہیں 
دکھ ہے کچھ اور مری جان _مسافت کا نہیں 
हम मज़ाफ़ात से____ आए हुए लोगों का मियाँ
मस'अला रिज़्क़ का होता है_ मोहब्बत का नहीं
ہم مضافات سے___ آئے ہوئے لوگوں کا میاں 
مسئلہ رزق کا ہوتا ہے____ محبت کا نہیں 
थोड़ी कोशिश से ही_ आ जाती है अब नींद मुझे 
इस का मतलब है कि___ वो मेरी तबियत का नहीं
تھوڑی کوشش سے ہی آ جاتی ہے اب نیند مجھے 
اس کا مطلب ہے کہ__ وہ میری طبیعت کا نہیں 
ये तो ख़ुद चल के___ निशाने पे लगे हैं तेरे
दख़्ल इसमें तो कोई__ तेरी महारत का नहीं
یہ تو خود چل کے___ نشانے پہ لگے ہیں تیرے 
دخل اس میں تو کوئی تیری مہارت کا نہیں 
रोज़ दरिया में ___जो इक फूल बहा देता हूँ
ये किसी दुख का इशारा है_ अक़ीदत का नहीं
روز دریا میں ___جو اک پھول بہا دیتا ہوں 
یہ کسی دکھ کا اشارہ ہے_ عقیدت کا نہیں 
हम हैं हारे हुए ___लश्कर के सिपाही साहिर 
फ़ाएदा हम को _किसी की भी हिमायत का नहीं
ہم ہیں ہارے ہوئے__ لشکر کے سپاہی ساحر
فائدہ ہم کو کسی کی بھی حمایت کا نہیں
जहाँज़ेब साहिर


सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है
मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है

ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह
आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है

दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज
वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है

ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर
इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है

आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे
वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है

ज़फ़र इक़बाल

सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है
मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है

ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह
आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है

दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज
वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है

ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर
इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है

आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे
वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है

ज़फ़र इक़बाल



तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा,
खुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा

अब आंखों को दरिया बनाना पड़ेगा
तबस्सुम का कर्ज़ा चुकाना पड़ेगा

बला से मेरा ग़म ना हो उन पर ज़ाहिर
जब आयेंगे वो मुस्कुराना पड़ेगा

चला हूं मैं कूचे से उनके बिगड़ कर
हंसी आ रही है कि आना पड़ेगा

खु़मार उनके घर जा रहे हो तो जाओ
मग़र रास्ते में ज़माना पड़ेगा।

ख़ुमार बाराबंकवी

बे-रुख़ी तू ने भी की ___उज़्र-ए-ज़माना कर के
हम भी महफ़िल से उठ आए हैं _बहाना कर के

क्या कहें_ क्या है उन आँखों में कि रख देती हैं
एक अच्छे भले इंसाँ को______ दीवाना कर के

कितनी बातें थीं कि न कहना थीं _वो कह भेजी हैं
अब पशेमान हैं _____क़ासिद को र'वाना कर के

जानते हैं_ वो तुनुक-ख़ू है_ सो अपना अहवाल
हम सुना देते हैं ______औरों के फ़साना कर के

कोई वीराना ए हस्ती की____ ख़बर क्या लाता
ख़ुद भी हम भूल गए __दफ़्न ख़ज़ाना कर के

आँख मसरूफ़ ए नज़ारा थी तो हम ख़ुश थे फ़राज़
उस ने क्या ज़ुल्म किया __दिल में ठिकाना कर के

अहमद फ़राज़ 





चारासाज़ों की _अज़िय्यत नहीं देखी जाती 
तेरे बीमार की हालत ___नहीं देखी जाती 

देने वाले की मशिय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़ 
माँगने वाले की हाजत ____नहीं देखी जाती 

दिन बहल जाता है__लेकिन तिरे दीवानों की 
शाम होती है____ तो वहशत नहीं देखी जाती 

तमकनत से___ तुझे रुख़्सत तो किया है लेकिन 
हम से इन आँखों की__ हसरत नहीं देखी जाती 

कौन उतरा है ____ये आफ़ाक़ की पहनाई में 
आइना-ख़ाने की ____हैरत नहीं देखी जाती

परवीन शाकिर

1√


कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें 
आए हैं इस गली में ____तो पत्थर ही ले चलें 
 
यूँ किस तरह कटेगा___ कड़ी धूप का सफ़र 
सर पर ख़याल-ए-यार की_ चादर ही ले चलें 
 
रंज-ए-सफ़र की____ कोई निशानी तो पास हो 
थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें

ये कह छेड़ती है__ हमें दिल-गिरफ़्तगी 
घबरा गए हैं आप __तो बाहर ही ले चलें 

इस शहर ए बे चराग़ में __जाएगी तू कहाँ
आ ऐ शब ए फिराक़__ तुझे घर ही ले चलें

नासिर काज़मी

3√





राख के ढेर पे___ क्या शो'ला-बयानी करते 
एक क़िस्से की_ भला कितनी कहानी करते 
 
शोला-ए-जाँ को __बुझाते यूँही क़तरा क़तरा 
ख़ुद को हम आग बनाते____ तुझे पानी करते 

फूल सा तुझ को __महकता हुआ रखते शब भर 
अपने साँसों से _______तुझे रात की रानी करते 

नद्दियाँ देखें___ तो बस शर्म से पानी हो जाएँ 
चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से__ पैदा वो रवानी करते 

सब से कहते__ कि ये क़िस्सा है पुराना साहब 
आह की आँच से_____ तस्वीर पुरानी करते

कोई आ जाता कभी यूँही अगर दिल के क़रीब 
हम तिरा ज़िक्र______ पए-याद-दहानी करते 
 
सच तो ये है_ कि तिरे हिज्र का अब रंज नहीं 
क्या दिखावे के लिए__ अश्क-फ़िशानी करते 
 
इरफ़ान सत्तार



हिज्र करते___ या कोई वस्ल गुज़ारा करते 
हम बहर-हाल __बसर ख़्वाब तुम्हारा करते 
 
एक ऐसी भी घड़ी __इश्क़ में आई थी कि हम 
ख़ाक को हाथ लगाते______ तो सितारा करते 
 
अब तो मिल जाओ हमें तुम_ कि तुम्हारी ख़ातिर 
इतनी दूर आ गए _____दुनिया से कनारा करते 

एक चेहरे में तो _____मुमकिन नहीं इतने चेहरे 
किस से करते___ जो कोई इश्क़ दोबारा करते 

जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए 
फिर कोई आए यहाँ _________कैसे गवारा करते 

कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब 
तेरी जानिब ही______ तिरे लोग इशारा करते 

ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ __और तिरा हुस्न कहाँ 
हम तिरे चेहरे से_____ आईना सँवारा करते

उबैदुल्लाह अलीम




तेरी शोरीदा मिज़ाजी के सबब__तेरे नहीं
ऐ मेरे शहर___ तिरे लोग भी अब तेरे नहीं

मैं ने एक और भी__ महफ़िल में इन्हें देखा है
ये जो तेरे नज़र आते हैं ____ये सब तेरे नहीं
 
ये ब-हर लहज़ा __नई धुन पे थिरकते हुए लोग
किसको मालूम  ___ये कब तेरे हैं कब तेरे नहीं
 
दर ब-दर हो के भी____ जो तेरी तरफ़ देखते थे
वो तेरे ख़ानुमाँ-बर्बाद भी _______अब तेरे नहीं

हो न हो ___दिल पे कोई बोझ है भारी वरना
बात कहने के ये अंदाज़  ___ये ढब तेरे नहीं
 
तेरा एहसान___ कि जाने गए __पहचाने गए
अब किसी और के क्या होंगे_ ये जब तेरे नहीं

इफ़्तिख़ार आरिफ़



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