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सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है
मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है
ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह
आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है
दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज
वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है
ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर
इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है
आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे
वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है
यह ग़ज़ल मशूर शायर जफ़र इकबाल की लिखी हुई शायरी है एक ग़ज़ल एक बाल की ही लिखी हुई है जो आपको बहुत ही ज्यादा पसंद आएगी
ज़फ़र इक़बाल
सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है
मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है
ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह
आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है
दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज
वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है
ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर
इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है
आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे
वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है
ज़फ़र इक़बाल
तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा,
खुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा
अब आंखों को दरिया बनाना पड़ेगा
तबस्सुम का कर्ज़ा चुकाना पड़ेगा
बला से मेरा ग़म ना हो उन पर ज़ाहिर
जब आयेंगे वो मुस्कुराना पड़ेगा
चला हूं मैं कूचे से उनके बिगड़ कर
हंसी आ रही है कि आना पड़ेगा
खु़मार उनके घर जा रहे हो तो जाओ
मग़र रास्ते में ज़माना पड़ेगा।
ख़ुमार बाराबंकवी
बे-रुख़ी तू ने भी की ___उज़्र-ए-ज़माना कर के
हम भी महफ़िल से उठ आए हैं _बहाना कर के
क्या कहें_ क्या है उन आँखों में कि रख देती हैं
एक अच्छे भले इंसाँ को______ दीवाना कर के
कितनी बातें थीं कि न कहना थीं _वो कह भेजी हैं
अब पशेमान हैं _____क़ासिद को र'वाना कर के
जानते हैं_ वो तुनुक-ख़ू है_ सो अपना अहवाल
हम सुना देते हैं ______औरों के फ़साना कर के
कोई वीराना ए हस्ती की____ ख़बर क्या लाता
ख़ुद भी हम भूल गए __दफ़्न ख़ज़ाना कर के
आँख मसरूफ़ ए नज़ारा थी तो हम ख़ुश थे फ़राज़
उस ने क्या ज़ुल्म किया __दिल में ठिकाना कर के
अहमद फ़राज़
चारासाज़ों की _अज़िय्यत नहीं देखी जाती
तेरे बीमार की हालत ___नहीं देखी जाती
देने वाले की मशिय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़
माँगने वाले की हाजत ____नहीं देखी जाती
दिन बहल जाता है__लेकिन तिरे दीवानों की
शाम होती है____ तो वहशत नहीं देखी जाती
तमकनत से___ तुझे रुख़्सत तो किया है लेकिन
हम से इन आँखों की__ हसरत नहीं देखी जाती
कौन उतरा है ____ये आफ़ाक़ की पहनाई में
आइना-ख़ाने की ____हैरत नहीं देखी जाती
परवीन शाकिर
1√
कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें
आए हैं इस गली में ____तो पत्थर ही ले चलें
यूँ किस तरह कटेगा___ कड़ी धूप का सफ़र
सर पर ख़याल-ए-यार की_ चादर ही ले चलें
रंज-ए-सफ़र की____ कोई निशानी तो पास हो
थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें
ये कह छेड़ती है__ हमें दिल-गिरफ़्तगी
घबरा गए हैं आप __तो बाहर ही ले चलें
इस शहर ए बे चराग़ में __जाएगी तू कहाँ
आ ऐ शब ए फिराक़__ तुझे घर ही ले चलें
नासिर काज़मी
3√
राख के ढेर पे___ क्या शो'ला-बयानी करते
एक क़िस्से की_ भला कितनी कहानी करते
शोला-ए-जाँ को __बुझाते यूँही क़तरा क़तरा
ख़ुद को हम आग बनाते____ तुझे पानी करते
फूल सा तुझ को __महकता हुआ रखते शब भर
अपने साँसों से _______तुझे रात की रानी करते
नद्दियाँ देखें___ तो बस शर्म से पानी हो जाएँ
चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से__ पैदा वो रवानी करते
सब से कहते__ कि ये क़िस्सा है पुराना साहब
आह की आँच से_____ तस्वीर पुरानी करते
कोई आ जाता कभी यूँही अगर दिल के क़रीब
हम तिरा ज़िक्र______ पए-याद-दहानी करते
सच तो ये है_ कि तिरे हिज्र का अब रंज नहीं
क्या दिखावे के लिए__ अश्क-फ़िशानी करते
इरफ़ान सत्तार
हिज्र करते___ या कोई वस्ल गुज़ारा करते
हम बहर-हाल __बसर ख़्वाब तुम्हारा करते
एक ऐसी भी घड़ी __इश्क़ में आई थी कि हम
ख़ाक को हाथ लगाते______ तो सितारा करते
अब तो मिल जाओ हमें तुम_ कि तुम्हारी ख़ातिर
इतनी दूर आ गए _____दुनिया से कनारा करते
एक चेहरे में तो _____मुमकिन नहीं इतने चेहरे
किस से करते___ जो कोई इश्क़ दोबारा करते
जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए
फिर कोई आए यहाँ _________कैसे गवारा करते
कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब
तेरी जानिब ही______ तिरे लोग इशारा करते
ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ __और तिरा हुस्न कहाँ
हम तिरे चेहरे से_____ आईना सँवारा करते
उबैदुल्लाह अलीम
तेरी शोरीदा मिज़ाजी के सबब__तेरे नहीं
ऐ मेरे शहर___ तिरे लोग भी अब तेरे नहीं
मैं ने एक और भी__ महफ़िल में इन्हें देखा है
ये जो तेरे नज़र आते हैं ____ये सब तेरे नहीं
ये ब-हर लहज़ा __नई धुन पे थिरकते हुए लोग
किसको मालूम ___ये कब तेरे हैं कब तेरे नहीं
दर ब-दर हो के भी____ जो तेरी तरफ़ देखते थे
वो तेरे ख़ानुमाँ-बर्बाद भी _______अब तेरे नहीं
हो न हो ___दिल पे कोई बोझ है भारी वरना
बात कहने के ये अंदाज़ ___ये ढब तेरे नहीं
तेरा एहसान___ कि जाने गए __पहचाने गए
अब किसी और के क्या होंगे_ ये जब तेरे नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
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