Sunday, 24 April 2022

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सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है

मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है


ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह

आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है


दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज

वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है


ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर

इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है


आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे

वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है 


यह ग़ज़ल मशूर शायर जफ़र इकबाल की लिखी हुई शायरी है     एक ग़ज़ल एक बाल की ही लिखी हुई है जो आपको बहुत ही ज्यादा पसंद आएगी

ज़फ़र इक़बाल






सच है_ कि तेरे चारों तरफ़ जम-घटा भी है

मैं पूछता हूँ____ क्या कोई मेरे सिवा भी है


ये दिल बुरा सही___ सर ए बाज़ार तो न कह

आख़िर तू इस मकान में_ कुछ दिन रहा भी है


दिल से गुज़र गया है वो ___बेगाना-वार आज

वो सूरत-आशना ही नहीं _____आशना भी है


ख़ुश है वो अपने घर में_ चलो ठीक है मगर

इतनी सी बात ने ___मुझे तड़पा दिया भी है


आँखों के शोर ओ गुल में __सुनाई न दी मुझे

वरना शिकस्त ए शीशा ए दिल की सदा भी है


ज़फ़र इक़बाल




तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा,

खुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा


अब आंखों को दरिया बनाना पड़ेगा

तबस्सुम का कर्ज़ा चुकाना पड़ेगा


बला से मेरा ग़म ना हो उन पर ज़ाहिर

जब आयेंगे वो मुस्कुराना पड़ेगा


चला हूं मैं कूचे से उनके बिगड़ कर

हंसी आ रही है कि आना पड़ेगा


खु़मार उनके घर जा रहे हो तो जाओ

मग़र रास्ते में ज़माना पड़ेगा।


ख़ुमार बाराबंकवी


बे-रुख़ी तू ने भी की ___उज़्र-ए-ज़माना कर के

हम भी महफ़िल से उठ आए हैं _बहाना कर के


क्या कहें_ क्या है उन आँखों में कि रख देती हैं

एक अच्छे भले इंसाँ को______ दीवाना कर के


कितनी बातें थीं कि न कहना थीं _वो कह भेजी हैं

अब पशेमान हैं _____क़ासिद को र'वाना कर के


जानते हैं_ वो तुनुक-ख़ू है_ सो अपना अहवाल

हम सुना देते हैं ______औरों के फ़साना कर के


कोई वीराना ए हस्ती की____ ख़बर क्या लाता

ख़ुद भी हम भूल गए __दफ़्न ख़ज़ाना कर के


आँख मसरूफ़ ए नज़ारा थी तो हम ख़ुश थे फ़राज़

उस ने क्या ज़ुल्म किया __दिल में ठिकाना कर के


अहमद फ़राज़ 






चारासाज़ों की _अज़िय्यत नहीं देखी जाती 

तेरे बीमार की हालत ___नहीं देखी जाती 


देने वाले की मशिय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़ 

माँगने वाले की हाजत ____नहीं देखी जाती 


दिन बहल जाता है__लेकिन तिरे दीवानों की 

शाम होती है____ तो वहशत नहीं देखी जाती 


तमकनत से___ तुझे रुख़्सत तो किया है लेकिन 

हम से इन आँखों की__ हसरत नहीं देखी जाती 


कौन उतरा है ____ये आफ़ाक़ की पहनाई में 

आइना-ख़ाने की ____हैरत नहीं देखी जाती


परवीन शाकिर


1√



कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें 

आए हैं इस गली में ____तो पत्थर ही ले चलें 

 

यूँ किस तरह कटेगा___ कड़ी धूप का सफ़र 

सर पर ख़याल-ए-यार की_ चादर ही ले चलें 

 

रंज-ए-सफ़र की____ कोई निशानी तो पास हो 

थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें


ये कह छेड़ती है__ हमें दिल-गिरफ़्तगी 

घबरा गए हैं आप __तो बाहर ही ले चलें 


इस शहर ए बे चराग़ में __जाएगी तू कहाँ

आ ऐ शब ए फिराक़__ तुझे घर ही ले चलें


नासिर काज़मी


3√






राख के ढेर पे___ क्या शो'ला-बयानी करते 

एक क़िस्से की_ भला कितनी कहानी करते 

 

शोला-ए-जाँ को __बुझाते यूँही क़तरा क़तरा 

ख़ुद को हम आग बनाते____ तुझे पानी करते 


फूल सा तुझ को __महकता हुआ रखते शब भर 

अपने साँसों से _______तुझे रात की रानी करते 


नद्दियाँ देखें___ तो बस शर्म से पानी हो जाएँ 

चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से__ पैदा वो रवानी करते 


सब से कहते__ कि ये क़िस्सा है पुराना साहब 

आह की आँच से_____ तस्वीर पुरानी करते


कोई आ जाता कभी यूँही अगर दिल के क़रीब 

हम तिरा ज़िक्र______ पए-याद-दहानी करते 

 

सच तो ये है_ कि तिरे हिज्र का अब रंज नहीं 

क्या दिखावे के लिए__ अश्क-फ़िशानी करते 

 

इरफ़ान सत्तार




हिज्र करते___ या कोई वस्ल गुज़ारा करते 

हम बहर-हाल __बसर ख़्वाब तुम्हारा करते 

 

एक ऐसी भी घड़ी __इश्क़ में आई थी कि हम 

ख़ाक को हाथ लगाते______ तो सितारा करते 

 

अब तो मिल जाओ हमें तुम_ कि तुम्हारी ख़ातिर 

इतनी दूर आ गए _____दुनिया से कनारा करते 


एक चेहरे में तो _____मुमकिन नहीं इतने चेहरे 

किस से करते___ जो कोई इश्क़ दोबारा करते 


जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए 

फिर कोई आए यहाँ _________कैसे गवारा करते 


कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब 

तेरी जानिब ही______ तिरे लोग इशारा करते 


ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ __और तिरा हुस्न कहाँ 

हम तिरे चेहरे से_____ आईना सँवारा करते


उबैदुल्लाह अलीम





तेरी शोरीदा मिज़ाजी के सबब__तेरे नहीं

ऐ मेरे शहर___ तिरे लोग भी अब तेरे नहीं


मैं ने एक और भी__ महफ़िल में इन्हें देखा है

ये जो तेरे नज़र आते हैं ____ये सब तेरे नहीं

 

ये ब-हर लहज़ा __नई धुन पे थिरकते हुए लोग

किसको मालूम ___ये कब तेरे हैं कब तेरे नहीं

 

दर ब-दर हो के भी____ जो तेरी तरफ़ देखते थे

वो तेरे ख़ानुमाँ-बर्बाद भी _______अब तेरे नहीं


हो न हो ___दिल पे कोई बोझ है भारी वरना

बात कहने के ये अंदाज़ ___ये ढब तेरे नहीं

 

तेरा एहसान___ कि जाने गए __पहचाने गए

अब किसी और के क्या होंगे_ ये जब तेरे नहीं


इफ़्तिख़ार आरिफ़





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